आपने कई प्रेरणादायक कहानियां सुनी होगी, जो अपने अंदर एक अनोखे और एक कड़े संघर्ष को समेटे हुए है। और एक कहानी गड़े हुए है। लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती है, जो पुरानी ज़रूर होती है, लकिन अपने अंदर एक नयापन लिए हुए होती है। ऐसी ही एक कहानी है गोविन्द जयसवाल की। जो कि पुरानी तो ज़रूर है. लेकिन उसका संघर्ष सुनकर हर बार एक नया जोश आजाता है। जिन्होंने एकदम से बहुत से उतार चढाव झेले। और बन गए आईएएस अफसर। गोविन्द जयसवाल के पिता पेशे से एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर थे। और उन्होंने गोविन्द को पढ़ने में कसर नहीं छोड़ी। और उन्हें पूरी मेहनत से पढ़ाया। और इस काबिल बना दिया, कि आज वो देश की सेवा कर रहे है। एक समय पर उनके पिता के पास करीब 40 रिक्शा थे ,लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया कि, उनके पिता को अपने वो सारे रिक्शा बेचने पड़ गए। और वे बहुत गरीब हो गए। और घर के खर्च के लिए रिक्शा तक चलाया।

माँ की तबियत के काऱण बेच दिए सारे रिक्शा
गोविन्द जयसवाल ने अपने बचपन के समय में काफी बुरा समय देखा। उनके जीवन में एक वक़्त ऐसा था, कि उनकी माँ बहुत बीमार थी। इलाज के लिए बहुत से पैसे की ज़रूरत थी। जिसके कारण उनके पिता को अपने सारे 40 रिक्शा बेचने पड गए थे। उनके पिता ने शुरू में तो 20 रिक्शा बेचे, लेकिन बाद में पैसे कम पड़ने की वजह से उन्हें अपने बाकी के भी 20 रिक्शा बेचने पड गए। जिसकी वजह उनके गर्म में कंगाली आ गयी।

रिक्शा चलाकर पढ़ाया बेटे गोविन्द जयसवाल को
गोविन्द के पिता नारायण जयसवाल जी ने अपनी पत्नी के इलाज के बाद कभी खुद को और परिवार को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने स्वयं ही घर का खर्चा चलाने के लिए ऑटो रिक्शा चलाने लगे। और गोविन्द को पढ़ाया लिखाया। गोविन्द ने भी पूरी मेहनत से पढ़ाई की। और सफलता हासिल की। और अपने पिता की मेहनत का फल इस कामयाबी से दिया।
2 रोटी कम खाते थे, ताकि बेटे की पढ़ाई में कमी न आये
बता दे कि, गोविन्द जयसवाल के पिता जी अपने खाने में कभी कभी दो रोटी कम भी खा लेते थे। ताकि बेटे की पढ़ाई ठीक से हो सके। वाकई हमारे लिए हमारे माता पिता हर वो काम कर सकते है। जो दुनिया की नज़रो में असंभव हो सकती है। यही ताकत होती है, जो इंसान को सफलता तक ले जाते है।

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गोविन्द जयसवाल दिल्ली में जाकर की तैयारी आईएएस की
गोविन्द जयसवाल ने साल 2005 में दिल्ली जाकर तैयारी शुरू की और पूरी मेहनत से परीक्षा की तैयारी करके साल 2007 में आईएएस बनकर लौटे थे। उस वक़्त उनके पिता का संघर्ष उनके लिए उनकी मेहनत की कीमत थी , जो गोविन्द ने आईएएस बनकर लौट दी।
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