Malegaon blast case – उच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल 2026 को मालेगांव विस्फोट प्रकरण में चार बचे हुए संदिग्धों को छोड़ दिया। इसमें राजेंद्र चौधरी भी शामिल थे, तथा धन सिंह, मनोहर राम सिंह नरवरिया, लोकेष शर्मा के ऊपर लगे सभी आरोप हटा लिए गए। आघात का कारण था 8 सितंबर 2006 का दिन, जब विस्फोट से 31 लोगों की जान चली गई। उसी घटना में 300 से अधिक लोग चोटिल हुए थे। सबूतों में विरोधाभास और लंबे समय तक चले कानूनी विवादों ने मामले को बेहद उलझा दिया। इस फैसले ने एक बार फिर जांच प्रक्रिया, न्याय में देरी और पीड़ित परिवारों को इंसाफ मिलने की उम्मीद पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं
Malegaon Blast फैसले की मुख्य बा
अदालत के फैसले में मालेगांव ब्लास्ट के कई पहलू उजागर हुए। सबूतों की कमी ने कुछ आरोपियों को छुटकारा दिला दिया। इसके अलावा, जांच एजेंसियों के तरीकों पर सीधे सवाल खड़े हुए। गलतियों के घेरे में जांच प्रक्रिया रही। हर कोने की ठीक से जांच न हो पाने से सब कुछ धुंधला रह गया। ऐसे में आरोप साबित करने तक पहुंचना असंभव-सा लगा
- हाईकोर्ट ने मुंबई में चारों पर लगे इलज़ाम हटा दिए।
- उन लोगों के खिलाफ हत्या का मामला चल रहा था,
- वहीं अपराधी साजिश के आरोप भी जुड़े थे।
- इसके अलावा यूएपीए के तहत भी कार्रवाई हुई।
- उस साल विशेष अदालत ने फैसला सुनाया,

Malegaon Blast केस का असर और उठते सवाल
इस फैसले ने मालेगांव ब्लास्ट केस में हलचल पैदा कर दी है। आरोपियों को छूट मिली, इधर जांचकर्ताओं के काम पर संदेह उठने लगा। अब लोग सोच रहे हैं कहीं जांच ढीली तो नहीं पड़ी? क्या सचमुच सभी सुराग जुटाए गए थे? फैसला आया, और साथ ही न्याय व्यवस्था के सामने सवाल भी
- करीब दो दशक बाद भी मामले में किसी को सजा नहीं मिल सकी।
- जांच ATS, CBI और NIA जैसी कई एजेंसियों के पास गई।
- अलग-अलग जांचों की थ्योरी में विरोधाभास सामने आए।
- पीड़ित परिवार अब भी इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं।

